ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे बनेगी देश की पहली ट्विन-ट्यूब अंडरवाटर सुरंग
भारत तकनीकी उन्नति के मामले में एक और बड़ा कदम उठाने जा रहा है। असम में ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे देश की पहली ट्विन-ट्यूब अंडरवाटर (पानी के नीचे) सुरंग बनने जा रही है, जिसे केंद्र सरकार के एक उच्च स्तरीय पैनल ने स्वीकृति दे दी है। यह अत्याधुनिक परियोजना न सिर्फ इंजीनियरिंग के क्षेत्र में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी, आर्थिक विकास और रणनीतिक सुरक्षा को भी कई गुना सुदृढ़ बनाएगी।
यह योजना असम के गोहपुर और नुमालीगढ़ के बीच, ब्रह्मपुत्र नदी के भीतर लगभग 32 मीटर नीचे 15.8 किलोमीटर लंबी बनी जाने वाली सुरंग से जुड़ी है। इस परियोजना का सबसे खास हिस्सा यह है कि इसमें दो अलग-अलग ट्यूब बनाई जाएंगी — एक सड़क वाहनों के लिए और दूसरी ट्रेन (रेल) के लिए। यह ट्विन-ट्यूब डिजाइन भारत में विश्व-स्तरीय इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण बनेगा।
विशेषताएं और तकनीकी विवरण
इस परियोजना को भौतिक रूप देने के लिए तीन मंत्रालय — सड़क परिवहन और राजमार्ग, रेल और रक्षा — मिलकर काम करेंगे। अनुमानित लागत लगभग 18,600 करोड़ रुपये है, जिसमें सुरंग, रेल-रोड लिंक और अप्रोच मार्ग शामिल हैं।
इस ट्विन-ट्यूब संरचना की कुछ प्रमुख तकनीकी बातें इस प्रकार हैं:
• एक ट्यूब रेल ट्रैक के लिए — इसमें एक सिंगल इलेक्ट्रिक ट्रेन लाइन होगी जिसमें बैलिस्टिक ट्रैक सिस्टम का उपयोग होगा।
• दूसरी ट्यूब सड़क वाहनों के लिए — यह सड़क वाहन यातायात को सहज रूप से बहन देगी।
• ट्रेन चलने के समय सड़क यातायात को रोकना होगा ताकि सुरक्षा बनी रहे।
• पूरा मार्ग लगभग 33.7 किलोमीटर का होगा — जिसमें सुरंग और उसके बाहर के रास्ते शामिल हैं।
• यह सुरंग समुद्र तल से 32 मीटर नीचे बनाई जाएगी।
पूरा निर्माण अनुमानतः 5 वर्षों के भीतर पूरा होने की उम्मीद है।
यात्रा का समय और दूरी में भारी कमी
सबसे बड़ी बदलाव वाली बात यह है कि इस सुरंग के बनने के बाद असम में गोहपुर और नुमालीगढ़ के बीच यात्रा का समय लगभग 6.5 घंटे से घटकर सिर्फ 30 मिनट रह जाएगा। मौजूदा सड़क मार्ग लगभग 240 किलोमीटर का है, जबकि यह सुरंग और मार्ग मिलकर इसे केवल 34 किलोमीटर का कर देंगे। इस बदलाव से यात्रियों को न सिर्फ समय की बहुत बचत होगी, बल्कि आर्थिक रूप से भी लोगों को फायदा मिलेगा क्योंकि परिवहन लागत, यातायात जाम और रास्ते की कठिनाइयों में भारी कमी आएगी।
पूर्वोत्तर को मिलेगा बड़ा विकास प्लेटफ़ॉर्म
यह परियोजना केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की सामाजिक-आर्थिक तस्वीर को भी बदलने वाला कदम है। ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्र लंबे समय से कई विकास योजनाओं का केंद्र रहा है, लेकिन उसकी विशालता और प्राकृतिक संरचना ने डेढ़ सौ वर्षों से अधिक समय तक कनेक्टिविटी की बाधा बनकर रोका हुआ था। इस सुरंग के बनने से:
उत्तर-पूर्वी राज्य जैसे अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मिजोरम से संपर्क और आसान होगा।
वाणिज्यिक परिवहन अधिक तेज़ी से और सुरक्षित रूप से कार्य करेगा।
पर्यटन और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।
निवेश व उद्योगों के लिए रास्ते खुलेंगे।
यह अलग-अलग क्षेत्रों के विकास की दिशा में एक बड़ा पाठ्यक्रम उद्धृत करता है, जो भारत को क्षेत्रीय रूप से और भी मजबूत बनाएगा।
रणनीतिक महत्व
सिर्फ नागरिक परिवहन ही नहीं, इस सुरंग का रणनीतिक महत्व भी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत-चीन सीमा से सटे पूर्वोत्तर हिस्सों में सेना की त्वरित और नियंत्रित तरीके से आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए यह सुरंग महत्व रखती है। किसी भी आपात स्थिति में सेना, सुरक्षा बल और आवश्यक सामग्री को तेजी से मिशन-स्थल तक पहुंचाने में सहायता मिलेगी। इससे भारत की रक्षा-तैयारी और क्षमता भी और अधिक मजबूत और लचीली होगी।
भारत की इंजीनियरिंग की नई पहचान
यह परियोजना भारत की इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षमता को वैश्विक स्तर पर स्थापित करेगी। विश्व में कुछ चुनिंदा देशों में ही ऐसी संरचनाएं संभव हो पाई हैं, और भारत अब उन देशों की सूची में शामिल होने जा रहा है। इससे यह संदेश मिलेगा कि हमारी तकनीक, योजना और निष्पादन क्षमता किसी से कम नहीं है।
निष्कर्ष: एक बदलाव की शुरुआत
भारत की इस परियोजना से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि देश अब पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़कर भविष्य को नया दिशा दे रहा है। न सिर्फ एक सुरंग बल्कि भारत की दृष्टि, विकास और आत्म-विश्वास का प्रतीक यह परियोजना बनने जा रही है। पूर्वोत्तर के लिए यह किसी स्वप्न की तरह है, जो अब वास्तविकता बनने को है।
Written by - ABHISHEK GAUTAM
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