बेरोज़गारी: एक समस्या नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़ा सवाल
आज के समय में बेरोज़गारी सिर्फ़ एक शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह करोड़ों युवाओं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी की सच्चाई बन चुकी है। पढ़ाई पूरी करने के बाद जब हाथ में डिग्री होती है, लेकिन सामने कोई नौकरी नहीं होती, तब एक युवा के मन में जो सवाल उठते हैं, वही सवाल धीरे-धीरे पूरे समाज की चिंता बन जाते हैं। भारत जैसे युवा आबादी वाले देश में बेरोज़गारी का बढ़ना केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक संकट भी है।
बेरोज़गारी क्या है?
सरल शब्दों में कहा जाए तो जब कोई व्यक्ति काम करने में सक्षम और इच्छुक होने के बावजूद उसे रोजगार नहीं मिल पाता, तो वह बेरोज़गार कहलाता है। बेरोज़गारी सिर्फ़ अनपढ़ लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि आज यह समस्या पढ़े-लिखे, डिग्रीधारी युवाओं को भी सबसे ज़्यादा प्रभावित कर रही है।
आज हालात ऐसे हैं कि इंजीनियरिंग, एमए, एमएससी, बीएड जैसी डिग्रियां लेने के बाद भी युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सालों लगा रहे हैं, फिर भी सफलता की कोई गारंटी नहीं होती।
भारत में बेरोज़गारी की मौजूदा स्थिति
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां युवाओं की संख्या सबसे ज़्यादा है। इसे कभी “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा गया था, लेकिन अगर यही युवा वर्ग बेरोज़गार रहेगा, तो यह डिविडेंड धीरे-धीरे “डेमोग्राफिक बोझ” बन सकता है।
शहरों में बेरोज़गारी का मतलब है—कंपनियों में सीमित भर्तियां, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अनुभव की मांग। वहीं गांवों में बेरोज़गारी का रूप थोड़ा अलग है—खेती पर निर्भरता, मौसमी काम और कम आय। कोरोना महामारी के बाद हालात और भी बिगड़ गए, जब लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं और कई छोटे व्यवसाय पूरी तरह बंद हो गए।
बेरोज़गारी के प्रमुख कारण
1. जनसंख्या में तेज़ वृद्धि
भारत की बढ़ती जनसंख्या बेरोज़गारी का सबसे बड़ा कारण मानी जाती है। हर साल लाखों युवा नौकरी की तलाश में बाज़ार में उतरते हैं, लेकिन उनके लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं होते।
2. शिक्षा और रोजगार में तालमेल की कमी
हमारी शिक्षा प्रणाली अभी भी ज़्यादा थ्योरी आधारित है। कॉलेज से निकलने के बाद युवाओं के पास डिग्री तो होती है, लेकिन इंडस्ट्री के हिसाब से जरूरी स्किल्स नहीं होतीं। नतीजा यह होता है कि कंपनियां “योग्य उम्मीदवार नहीं मिलने” की बात करती हैं और युवा “नौकरी नहीं मिलने” की।
3. औद्योगिक विकास की धीमी रफ्तार
अगर उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तेज़ी से बढ़े, तो रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। लेकिन कई जगहों पर निवेश की कमी, नीतिगत दिक्कतें और तकनीकी बदलाव के कारण रोजगार सृजन उतनी तेजी से नहीं हो पा रहा।
4. तकनीकी बदलाव और ऑटोमेशन
आज मशीनें और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कई ऐसे काम कर रही हैं, जिन्हें पहले इंसान करता था। इससे उत्पादकता तो बढ़ी है, लेकिन पारंपरिक नौकरियों में कमी भी आई है।
5. सरकारी नौकरियों पर अत्यधिक निर्भरता
भारत में आज भी सरकारी नौकरी को सबसे सुरक्षित और सम्मानजनक माना जाता है। इसी वजह से लाखों युवा सीमित सरकारी पदों के लिए सालों तक तैयारी करते रहते हैं, जबकि निजी और स्वरोज़गार के अवसरों को नजरअंदाज़ कर देते हैं।
बेरोज़गारी का समाज पर प्रभाव
बेरोज़गारी का असर सिर्फ़ व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है।
मानसिक तनाव और डिप्रेशन: लंबे समय तक बेरोज़गार रहने से आत्मविश्वास टूटने लगता है।
आर्थिक समस्याएं: आय न होने से परिवार पर बोझ बढ़ता है।
अपराध और असामाजिक गतिविधियां: कई बार बेरोज़गारी युवाओं को गलत रास्ते पर धकेल देती है।
पलायन: गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ता है, जिससे शहरी समस्याएं और गंभीर हो जाती हैं।
युवाओं की बदलती सोच और संघर्ष
आज का युवा सिर्फ़ नौकरी नहीं चाहता, बल्कि सम्मान और सुरक्षित भविष्य भी चाहता है। लेकिन जब सालों की मेहनत के बाद भी उसे बेरोज़गारी का सामना करना पड़ता है, तो वह खुद को सिस्टम से ठगा हुआ महसूस करता है।
सोशल मीडिया पर आज बेरोज़गारी से जुड़ी कहानियां, मीम्स और अनुभव आम हो गए हैं। कोई लिखता है—“डिग्री है, हुनर है, लेकिन नौकरी नहीं है।” यह सिर्फ़ एक लाइन नहीं, बल्कि लाखों युवाओं की आवाज़ है।
सरकार द्वारा किए गए प्रयास
सरकार ने बेरोज़गारी कम करने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जैसे—
मेक इन इंडिया
स्टार्टअप इंडिया
स्किल इंडिया
मुद्रा योजना
इन योजनाओं का उद्देश्य युवाओं को रोजगार देने के साथ-साथ उन्हें स्वरोज़गार के लिए प्रेरित करना है। हालांकि ज़मीनी स्तर पर इन योजनाओं की सफलता अभी भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है।
बेरोज़गारी का समाधान क्या हो सकता है?
1. स्किल आधारित शिक्षा
शिक्षा प्रणाली को नौकरी-उन्मुख बनाना बेहद ज़रूरी है। कोर्सेज़ में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग और इंडस्ट्री एक्सपोज़र शामिल होना चाहिए।
2. स्वरोज़गार को बढ़ावा
हर युवा को नौकरी देने के बजाय उसे नौकरी देने लायक बनाना ज़्यादा कारगर उपाय है। छोटे व्यवसाय, स्टार्टअप और लोकल उद्योगों को बढ़ावा देना होगा।
3. ग्रामीण विकास
अगर गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, तो शहरों पर दबाव कम होगा। कृषि के साथ-साथ ग्रामीण उद्योगों को मजबूत करना जरूरी है।
4. निजी क्षेत्र में सुधार
निजी कंपनियों को रोजगार सृजन के लिए प्रोत्साहन देना और श्रम कानूनों को सरल बनाना भी एक समाधान हो सकता है।
निष्कर्ष
बेरोज़गारी सिर्फ़ आंकड़ों की समस्या नहीं है, यह सपनों, उम्मीदों और आत्मसम्मान से जुड़ा मुद्दा है। जब एक युवा बेरोज़गार होता है, तो उसका असर उसके परिवार, समाज और अंततः देश के विकास पर पड़ता है।
आज ज़रूरत है कि सरकार, शिक्षा संस्थान, उद्योग और युवा—सभी मिलकर इस समस्या का समाधान खोजें। तभी भारत अपनी युवा शक्ति को सही दिशा में उपयोग कर पाएगा और बेरोज़गारी को कमजोरी नहीं, बल्कि बदलाव का अवसर बना सकेगा।
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